मैं सोचता हूँ कि
वो मजदूर जो शाम को
थक के घर जा रहा है
क्या मेरी तरह वो भी यही सोच रहा है
कि जीवन किधर जा रहा है
या जीवन बिना सोचे जिया जाए
तो बिल्कुल ही सहज है
और दिल-दिमाग का खालीपन
बस भरे हुए पेट की उपज है
वो मजदूर जो शाम को
थक के घर जा रहा है
क्या मेरी तरह वो भी यही सोच रहा है
कि जीवन किधर जा रहा है
या जीवन बिना सोचे जिया जाए
तो बिल्कुल ही सहज है
और दिल-दिमाग का खालीपन
बस भरे हुए पेट की उपज है
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