जब से दिल ये दुनिया से बे-ख़बर हो गया
गम का एक-एक दाव बे-असर हो गया
तरक्की इतनी हुई कि दुनिया एक गाँव हो गई
जाने गाँव को क्या सूझा कि वो शहर हो गया
हाथों में खंज़र ले के लोग दिल में रहने आये
मै हर रिश्ते के बाद खून से तर-ब-तर हो गया
आदमी के हाथों में कोई तो जादू है
अमृत को लगाया हाथ तो वो ज़हर हो गया
जब से मिट गई है मंजिल की चाह मेरी
तब से और भी आसान ये सफ़र हो गया
1 comment:
shashank, last line mein khoob sach hai.... I guess usme Buddha ka message hai, which tells us that one becomes free when one overcomes one's own desires...
I loved this poem for its simplicity in first and last lines....
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