यूँ ही बस यूँ ही....
मै ये अक्सर सोचता हूँ...
बेमतलब की चीजों में ....
मै क्या खोजता हूँ...
चाय की एक घूँट में...
सिगरेट के एक कश में....
क्या मिल जाता है...
जब धुआँ घुलता है नस में...
क्यूँ बैठ कभी घंटों....
मै शून्य निहारता हूँ....
ये धीमे धीमे से दिल में....
मै किसे पुकारता हूँ....
जिसे भरता हूँ धुएँ से.....
ये कैसा ख़ालीपन है....
करता हूँ हल्की-फ़ुल्की बातें...
पर भारी भारी मन है....
क्यूँ कभी भी....
कुछ करने का दिल नहीं करता....
क्यूँ सदा रोकता हूँ ख़ुद को...
क्यूँ हद से नहीं गुजरता.....
कहाँ खोया रहता हूँ...
जब मिलता हूँ किसी से...
किसका देखता हूँ रास्ता ...
कौन आ जाएगा कहीं से.
मै जिनकी आँखों में....
अपनी मंज़िल तलाशता हूँ.....
वो मुझसे हो कर गुजरते हैं....
मै उनका रास्ता हूँ.....
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