Sunday, February 10, 2013

बिना सर-पैर बेकार की सोच .....

सुबह के धुंधले उजाले ......
शाम के कुछ बादल काले......
दिल में ऊब ,चेहरा मायूस ......
होता नहीं कुछ भी महसूस .....
छोटा सा कोना ,रोज़ का रोना ......
कट जाना दिन का और कुछ ना होना  ......
बुरी है ये जीने की आदत  .....
दुनिया को रखे खुदा सलामत  .....
साँस का अन्दर-बाहर जाना  .....
कदमों का चलना ,घर का आना  .....
बिना सर-पैर  बेकार की सोच  .....
पीछे हटना हार की सोच  .....
उलटे-सीधे रिश्ते चंद .....
फटी ख्वाईशें ,दिखती पैबंद ......
जीवन खंडहर ,रिश्तों के जाले  ......
शाम के कुछ बादल काले ......
नफरत की मिर्च ,प्यार का शक्कर .....
वहीं पे आये काट के चक्कर .....
आग छुअन  की ,तन की अंगीठी .....
ज़हर बुझी हैं बातें मीठी .......
कल-कल बहता याद का झरना .......
सुबह से शाम किश्तों में मरना .....
खाली दिल और भरी है जेब .....
नकली हंसी,हर बात फ़रेब ......
सब हैं यहाँ दो चेहरे वाले .......
शाम के कुछ बादल काले .........

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