Sunday, January 23, 2011

सब में ही ख़ालीपन है............

घृणा की आग है या प्रीत का अनुरोध है
सब में ही ख़ालीपन है,एक व्यर्थता का बोध है

दंभ की हुंकार है या दया की पुकार है
कोई फ़र्क नहीं हाथ में,फूल है कि तलवार है
अहसान उतारना है,या लेना प्रतिशोध है
सब में ही ख़ालीपन है,एक व्यर्थता का बोध है

भीड़ में गुम है कोई या एक अलग पहचान है
मंदिर की राम-राम है या मस्जिद की अज़ान है
समझौता है उसूलों से या व्यवस्था का विरोध है
सब में ही ख़ालीपन है,एक व्यर्थता का बोध है

मन चाह से परे है या किसी चीज की तलाश है
सोया हुआ इंसान है या चीखती कोई लाश है
ईमानदार सी कोशिश है या नपुंसक सा क्रोध है
सब में ही ख़ालीपन है,एक व्यर्थता का बोध है

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