मै सोचता हूँ
ये हवा जो बह रही है....
आखिर क्या कह रही है.....
ये जो इसकी छुअन है ....
इसमें क्यूँ इतनी सिहरन है.......
मै सोचता हूँ.....
गर जो मै बह जाता इसके संग....
तो ये मुझे कहाँ ले जाती.....
मै सोचता हूँ....
ये क्यूँ नहीं मेरे ग़मों को बहा ले जाती.....
कभी लगता है....
मै जो भी सोचता हूँ.....
क्या उस में कुछ भी सच्चाई है......
मुझे लगता है कि ये सरसराहट हवा की नहीं......
ये मेरी चीखती तन्हाई है......
मै सोचता हूँ कि.....
ये हवा जो मुझे यूँ छूती है.......
क्या उसके बदन से भी यूँ ही लिपटती होगी...
और जैसे मेरे स्पर्श से सिमटती थी वो......
क्या हवा के स्पर्श से भी,वैसे ही सिमटती होगी.........
1 comment:
wonderful expression of universal feeling that we all have for those whom we loved.....
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